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آنجا كه آب، |
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آب گوارا، سرد |
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زير ركاب و چكمه او مي تافت، |
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او در زلال خويش نظر مي كرد |
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درياچة صفا |
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بر سينه فرات فروزان بود. |
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در شط، عنان اسب رها كرد |
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كف زير آب برد |
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ابري لطيف و نرم چو غفلت |
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خورشيد لحظه را |
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گويي به قدر جنبش يك موج از نسيم |
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در زير خواب برد |
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ناگاه |
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سيلي ز خاطرات |
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جاري به روي آينه صاف آب شد |
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درياي غيرتش متلاطم گشت |
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آنگاه |
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آن دست تابناك |
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با چار چشم بر سر آن آبها گريست |
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دريايي از صفا |
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بر سينه فروزان بود |
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آنجا كه آب |
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آب گوارا، سرد |
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زير ركاب و چكمه او مي تافت |
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او در زلال دوست نظر مي كرد |
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مشكي به دوش دور شد از التهاب شط |
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اما |
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تصوير اين زلالي بي پايان |
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تا دامن ابد |
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در جويبار زمزمه تاريخ |
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تكرار مي شود. |
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احمد زارعي |
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اطلاعات |
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29/6/83 |