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به سوي آب شد سقاي
محشر |
به رزم اندر بدي سبط
پيمبر |
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به آب اندر شدي آن
ميراب هستي |
چو سيل از كوهساران
سوي پستي |
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يم رحمت چو در نم شد شناور |
خميد از پشت خنك كوه
پيكر
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كف كافيش پر بنمود
از آب |
كه سازد لعل خشك از
آب سيراب |
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به ياد تشنگان وادي
غم |
فراقش در نظر شد
بحري از سم |
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به خود ميگفت باشد
از ادب دور |
كه من سيراب و شه از آب مهجور |
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محمد تقي حجةالاسلام نير
تبريزي |
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